Wednesday, January 6, 2016

(21)
भक्ति के प्रताप से, आवागमन का सब दुःख दूर हुआ ।
मुक्ति पदारथ मिल गया, दिल खुशियों से भरपूर हुआ ।।
सन्तों की संगति से, दुख चिन्ता सब दूर हुईं ।
नाम भक्ति की कमाई से, दिल में खुशियाँ भर गईं ।।
(22)
बड़े भागों से मानुष जन्म मिला, इसे यूँही नहीं गुज़ार देना ।
मालिक की करके भक्ति, जन्म अपना सँवार लेना ।।
ये दुर्लभ मानुष जन्म, बार बार नहीं पायेगा ।
चूक गया गर अपने काम से, फिर पीछे पछतायेगा ।।
(23)
वणज कोर वणजारियो, नाम की कमाई कर लो ।
स्वाँस स्वाँस में नाम जपकर, भक्ति का लाभ उठा लो ।।
स्वाँस बड़े अनमोल हैं, पर नाम की क़ीमत भारी ।
नाम बिना इक स्वाँस जो जाये, तो हानि होयेगी भारी ।।
सच्चा नाम कमावना, सच्चा यह धन सार है ।
सच्ची रास परलोक की, सच्चा प्रभु का प्यार है।।
स्वाँस स्वाँस में सुमिरण कर लो, यह सच्चे सुख का सार है।
सतगुरु की सच्ची ओट पकड़ लो, भव से बेड़ा पार है।।
(24)
बार-बार न पावसें, ऐसा दुर्लभ अवसर प्राणी ।
बड़े भागों से पाया है, यह मानुष तन इन्सानी ।।
इस अनमोल तन को पाकर, गर इसकी क़द्र न जानी ।
जन्म जन्म भटकता रहेगा, बहुर न मिले ज़िन्दगानी ।।
अभी वक्त है ग़फलत से हो बेदार, भजन प्रभु का कर ले प्राणी ।
मुक्ति पद को सहजे पाये, गर तूने सन्तों की बात मानी ।।
(25)
झूठी काया झूठी माया, इस पर क्या एतबार है ।
या है सो जायेगा, किसी को नहीं करार है।।
छोड़ के दुनिया के झमेले, सच्चे नामसे करता प्यार है।
जीवन सफल हो जाता सका, भव से होता पार है ।।
(26)
स्वाँस स्वाँस में बीते जा रही है, तेरी अनमोल ज़िन्दगी ।
अगर इसमें किया न काम अपना, तो फिर पछताना पड़ेगा ।।
(27)
स्वाँसों की मिली अनमोल पूँजी,
इसकी क़द्र तू जान ले ।
त्रिलोकी से बढ़कर इक स्वाँस की कीमत,
देख ज़रा पहचान ले ।।
सत्पुरुषों का संयोग मिला है,
हर बार नहीं मिल पायेगा ।
सत्संग, सुमिरण, भजन-भक्ति का,
फिर समय हाथ न आयेगा ।।
निकल गया जब समय हाथ से,
फिर तलियाँ मल पछतायेगा ।
चेत जा अब भी नाम सुमिर ले,
दरगाह में ढोई पायेगा ।।
(28)
ज़रा सोच समझ ऐ प्राणी,
इस जग में क्योंकर आया है।
क्या मतलब है यहाँ आने का,
किस ख़ातिर मालिक ने भिजवाया है।।
बीत गया सब वक़्त क़ीमती,
कभी ध्यान न इधर फ़रमाया है।
धन यौवन और प्रभुता के मद में,
अपना काम भुलाया है।।
है वक़्त अभी तू जाग ज़रा,
सन्तों की शरण में आ प्यारे ।
करके भजन-भक्ति की सच्ची कमाई,
जीवन का लाभ उठा प्यारे ।।
(29)
काल-माया की अन्धेरी रात में, यह जीव है भटक रहा ।
बिना ज्ञान की रोशनी के, है बहुत दुःख उठा रहा ।।
भाग से जब मिल गये सतगुरु, तो ज्ञान का उजियारा हो गया ।
अज्ञान तिमिर सब मिट गया, सुख का सवेरा हो गया ।।
(30)
आये जिस काम को, कर लो अपना काम ।
फिर पीछे पछताओगे, जब छूट जायेंगे प्राण ।।

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