अपनी मंज़िल
दुनिया की हालत को देख कर,
बन्दे तू जान जायेगा ।
न कोई आया है साथ में,
न कोई तेरे साथ जायेगा ।।
थोड़ा ही वक़्त मिला था तुझको,
अपना काम करने के लिये ।
बिछुड़ी हुई रूह को
अपने मालिक के संग मिलाने के लिये ।।
झूठी ममता में पड़ कर,
अपने काम को तू भूल गया।
जाना था किस तरफ़,
और चला किधर गया ।।
मोह ममता की नींद में तू,
इतना ग़ाफिल हो गया ।
सोचा न अपनी मंज़िल को,
कि सफ़र कितना लम्बा है मेरा ।।
गर न किया तय अपना सफ़र,
तो दूरी और बढ़ जायेगी ।
कई जन्मों से भटकी तेरी रूह,
फिर दोबारा भटक जायेगी ।।
होश में आ ज़रा चेत जा,
पूछ ले अपनी मंज़िल का रास्ता ।
सत्पुरुषों की शरण में आकर,
तय कर ले अपना रास्ता ।।
सत्पुरुष तेरी मंज़िल को,
आसान बना देंगे ।
गर चलेगा उनकी राहनुमाई में,
वह मंज़िल तक पहुँचा देंगे ।।
यही है केवल एक रास्ता,
जो सत्पुरुष बतलाते हैं।
भूली भटकी रूहों को,
सद् मार्ग दिखलाते हैं ।।
भाग से मिल जायें सतगुरु,
तो बड़ी खुशकिस्मती होती है।
कट जाता है आवागमन का चक्कर,
और मुक्ति मिल जाती है ।।
वही काम है तेरा दास,
जो इस जन्म में हो जायेगा ।
सतगुरु की शरण में आकर,
परमातम से मेल हो जायेगा ।।
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