(11)
अगर है तुझको सच्चे सुख की तलाश ।
तो दिल से हटा झूठी दुनिया की आस ।।
गुरु-शब्द को ले अपने दिल में बसा ।
पायेगा यक़ीनन सच्चे सुख को सदा ।।
(12)
क़ाबिले-फ़ख़र नहीं मुल्क का सुल्तां होना ।
इक बड़ी चीज़ है इन्सान का इन्सां होना ।।
इन्सानी तन पाकर जो करता है भक्ति भगवान की ।
सही मायनों में यही पहचान है इन्सान की ।।
(13)
तारीख़ तुम्हें बतलायेगी,
दुनिया में खुशी का नाम नहीं ।
जिस दिल पे हवस का सिक्का है,
उस दिल के लिए आराम नहीं ।।
जो दिल हवस से पाक हुआ,
दुःख दर्द उसका सब दूर हुआ ।
जिस दिल में नाम की लगन लगी,
वह खुशियों से भरपूर हुआ ।।
(14)
तमन्ना है हर इन्सान की,
मैं हमेशा सुखी और आनन्द में रहूँ।
कभी भी दुःख मुझको न सताये,
सदा खुशियों से भरपूर रहूँ ।।
भुला कर प्रभु के नाम को,
यह सुख चैन कैसे पायेगा ।
सुख की इच्छा तभी होगी पूरी,
जब मालिक का नाम दिल में बसायेगा ।।
(15)
अगर है राम से मिलना, तो मुहब्बत दुनिया की दिल से हटा प्यारे।
तलब है अगर प्रभु के प्रेम की, तो प्रीत नाम से लगा प्यारे ।।
(16)
कारूँ गंज ख़ज़ाना जोड़ा, आख़िर सब कुछ छोड़ गया ।
मुल्कगिरी की हवस हुई न पूरी, सिकन्दर भी दम तोड़ गया ।
गये दोनों हाथ खाली जहां से, कुछ भी साथ न ले गये ।
हसरत किसी की हुई न पूरी, आख़िर सबको कह गये ।
करना मत भरोसा इस दुनिया पे, यह काम न किसी के आयेगी ।
इक प्रभु की भक्ति केवल, जो अन्त में साथ निभायेगी ।।
(17)
धन-सम्पत्ति और रिश्ते-नाते, सुत दारा और मीत ।
अन्तकाल सब बिछुड़ जायेंगे, झूठी इनकी प्रीत ।।
सच्चे नाम से प्रीत लगा ले, होय जो अन्त सहाई ।
छोड़ के झूठी ममता जग की, रहो नाम लिव लाई ।।
(18)
तुझे मालूम हे किस वासते, इस दहर में आया ।
वह क्या मतलब था, जिस वासते हीरा जन्म तूने पाया ।।
आकर इस धराधाम पे, अपने मक़सद को भुला दिया ।
करनी थी भक्ति प्रभु की, तूने माया में चित्त लगा दिया ।।
होगी बड़ी भारी हानि, किया न गर तूने काम अपना ।
उठायेगा बड़ा कष्ट भारी, होगा न कोई यगाना अपना ।।
साथ न देंगे अन्त को, ये रिश्ते-नाते बहन और भाई ।
कर ले नाम की कमाई, अंत में होगा जो संगी और सहाई ।।
(19)
मालिक ने दिया तुझे अनमोल मानुष जनम ।
इसको पा करके कर ले कुछ नेक करम ।।
भक्ति की कर के कमाई बना ले सफल ये जीवन ।
छूट जायेगा तेरा जनम और मरन ।।
नाम भक्ति ही है इक मुक्ति का साधन ।
जिसने कर ली भक्ती की कमाई ,
उसका हुआ धन्य जीवन ।।
बार बार नहीं फिर चौरासी में जायेगा ।
अगर है सच्चे नाम का तोशा,
तो दरगाह में ढोई पायेगा ।।
(20)
सन्तों की शरण में जाकर, काम अपना सँवारो ।
उनसे लेकर दात नाम की, भक्ति धन संचित करो ।।
अन्त में भक्ति का धन साथ होगा, तो मालिक रीझ जायेंगे ।
रूह को मिलेगी मुक्ति, चौरासी के बन्धन टूट जायेंगे ।।
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