मन पर नियन्त्रण
चंचल मन नहीं स्थिर रहता, लाख कोई समझाये ।
गुरु शब्द का चाबुक लागे, तब यह वश में आये ।।
बड़े बड़े शूर और योद्धा, इससे वे घबरायें ।
दुनिया पर जो विजय हैं पाते, इससे भय वे खायें ।।
रावण जैसा सूरमा देखे, जिनसे काल बलि था डरता ।
मन के मारे वह भी मर गये, मन पर वश न चलता ।।
कौन है ऐसा दुनिया में, जो मन को मार भगावे?
जन्म-जन्मों की दुखिया रूह का, इससे पीछा छुड़ावे?
पारब्रह्म पूर्ण सतगुरु, धराधाम पर आते।
अपना नाम का देकर अंकुश, मन पर वार लगाते।।
जो कोई इनकी शरण में आये, युक्ति हैं बतलाते ।
सुमिरण-ध्यान, सेवा सत्संग, ये नियम हैं सिखलाते ।।
इन पर जो भी अमल है करता, उसका मन वश आवे ।
रूह को मिले सच्ची शान्ति, परम आनन्द को पावे ।।
ऐसा जन्म अमोलक मानुष तन, बार-बार नहीं पावे ।
सतगुरु नाम को जप ले प्राणी, बहुर जन्म नहीं आवे ।।
सतगुरु जी जो रहमत होवे, तब यह अवसर मिलता ।
जन्म-जन्म से भटका प्राणी, प्रियतम संग है मिलता ।।
ऐसे सतगुरुदेव के, मैं बार-बार बलि जाउँ ।
जिनकी किरपा दृष्टि से, मैं भवसागर तक जाऊँ ।।
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