अपना काम
दुनिया के धन्धों में यह प्राणी,
इतना मशग़ूल रहता है।
न आता है याद काम अपना,
न दिल को आराम आता है।।
साथ जाने वाली वस्तु से,
नहीं यह प्यार करता है।
जिनके पीछे इतना फ़िदा होता,
उनमें न कोई साथ जाता है।।
मिलें न जब जब तलक सतगुरु पूर्ण,
मोह-माया के ख़्याल भरपूर होते हैं।
न चैन आता है रूह को,
न ग़म दिल के दूर होते हैं ।।
प्रभु का सच्चा नाम है साथी,
जो अन्त में साथ जाता है।
काल से निर्भय हकर,
दरगाह में मान पाता है ।।
सच्चा धन
बहुत धनमाल इकट्ठा किया,
अन्त में कुछ साथ न गया ।
यह धन दौलत आख़िर साथ न जानी है।।
बहुत परिवार बनाया,
मोह के बन्धन में फँसा ।
आख़िर किसी ने भी नहीं निभानी है ।।
मान मर्तबा भी पाया,
आख़िर वह भी काम न आया ।
अन्त में होती बहुत परेशानी है।।
दोस्त मित्र बनाये,
मुश्किल में कोई काम न आये ।
आख़िर में होती बड़ी हैरानी है ।।
सन्त देते हैं दुहाई,
कर लो सच्चे नाम की कमाई ।
अन्त समय यही तुम्हारे काम आनी है ।।
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