(61)
लख चौरासी भ्रमते-भ्रमते, दुर्लभ देह है पाई ।
मोह निद्रा से जाग ज़रा, प्रभु मिलन की बारी आई ।।
सन्तों की संगति में आकर, नाम भक्ति का धन कमा ले ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला ले ।।
(62)
दीवाली की बाहरी खुशियों में, सब लोग मशग़ूल हैं।
दिल से मालिक के नाम को भुलाकर, सच्ची खुशियों से महरूम हैं ।।
सही मायनों में सच्ची दीवाली उसकी है,
जिसने सच्चे नाम से लिव लगाई है।
छोड़ के झूठी ममता जग की,
मालिक के नाम की प्रीत दिल में बसाई है ।।
(63)
आये हो जिस काम को, कर लो अपना काम ।
दोनों लोक सँवर जायेंगे, दरगह में पाओगे मान ।।
काम अपनी यही है, कर लो भजन भक्ति की कमाई ।
जो आत्मा परमात्मा में मिल जाये, सब दुःखों से हो रिहाई ।।
(64)
किस काम के लिये आया, किसलिये मिली यह ज़िन्दगी ।
ज़रा स पर तू कुछ विचार कर, यूँ चली न जाये रायेगाँ ज़िन्दगी ।।
सन्तों सत्पुरुषों की संगति में आकर, इस पर विचार कर ले ।
नाम भक्ति की कमाई करके, अपनी रूह का सुधार कर ले ।।
(65)
रेत की दीवार सम, नश्वर सकत संसार है।
थिर यहाँ कुछ है नहीं, जो कुछ है चालनहार है।।
एक प्रभु का नाम सच्चा, परम सुख का सार है।
जिसके दिल में बस गया, उसका बेड़ा पार है ।।
(66)
बड़े भागों से मानुष जन्म मिला, बार बार नहीं पाओगे ।
इसमें अपना काम बना लो, वरना फिर पछताओगे ।।
सन्तों की शरण में कर, नाम भक्ति का धन कमा लो ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला लो ।।
(67)
अगर तू चाहता है खुशियों से हमेशा रहूँ शाद ।
तो एक दम भूले नहीं तेरे दिल सेप्रभु की याद ।।
प्रभु की याद से ज़िन्दगी सँवर जायेगी ।
ग़म चिन्ता से होगा बरी सुख शान्ति दिल में भरी रहेगी ।।
(68)
रहो जग में रखो सुरति गगन में, रंगो मन अपना भक्ति की लगन में ।
करो दुनिया के काम बेशक, न दुनिया को बसाओ अपने मन में ।
रहो जैसे जहाँ हो जी तुम्हारा, मगर गफ़लत न हो हरि के भजन में ।
मुहब्बत मत बढ़ाओ झूठे जग से, रहो कमल की न्याई इस चमन में ।।
(69)
एक रतन है इस जहां में जो मिलता बारम्बार नहीं ।
ज्यों फूल गिरा जब डाली से, फिर होता वो गुलज़ार नहीं ।।
इस रतन की क़ीमत भारी, जानत लोग गँवार नहीं ।
काँच किरिच बदले में लेवें, जपते हर हर सार नहीं ।।
(70)
दुनिया में हर एक इंसान, सुख और शान्ति का तलबगार है।
मगर मिलता नहीं उसे सुख, वो दुख और गम से बेज़ार है ।।
सही मायनों में उस गुरुमुख के, दिल में खुशी समाई है ।
जिसने जग की तृष्णा छोड़कर, नाम से लिव लगाई है ।।
(71)
मानुष जन्म को पाकर बन्दे, कर ले अपना काम ।
फिर पीछे पछतायेगा, जब निकल जायेंगे प्राण ।।
नाम भक्ति की कमाई करके, पूरा कर ले काम ।
आवागमन का चक्कर छूटे, तेरी रूह का हो कल्याण ।।
(72)
दुनिया में हर एक इन्सान, सुख शान्ति का तलबगार है।
करता है यत्न बहुत, पर वो रहता बेक़रार है ।।
अपने ख्यालों को छोड़कर, जो सन्तों की शरण में आ गया ।
भक्ति की सच्ची कमाई करके, वो भरपूर सुख को पा गया ।।
(72)
खूबी-ए-किस्मत से तुजे जामा मिला इन्सान का,
अपने लक्ष्य को समझकर भजन कर भगवान का ।
भजन भक्ति से हो जायेगा तेरी रूह का कल्याण,
आवागमन मिट जायेगा पायेगा पद निर्वाण ।।
(72)
सच्ची खुशियों को वो पाते हैं,
जो अपने दिल में राम को बसाते हैं।
झूठी दुनिया की ममता छोड़ करके,
जो प्रभु नाम से चित्त लगाते हैं ।
(75)
कर्म ऐसा होना चाहिये जि जीवन में खुशहाल हो जाये ।
सन्तों की संगत और भक्ति की कमाई से
परलोक भी बहाल हो जाये ।।
(76)
खाओ पीओ खुशियाँ मनाओ, पर बात न भूलो एक ।
श्री आरती-पूजा, सत्संग, सेवा, सुमिरण-ध्यान नित करो,
चाहे बाधा पड़े अनेक ।।
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