अपने मक़सद की पहचान
कितने हैं दुनिया में लोग जो ऐसे ज़िन्दगी बसर करते हैं ।
क्या वो ज़िन्दगी में मक़सद के पहचानने का दम भरते हैं।।
बड़े बड़े मुदब्बिर धनी और पंडित भी यहाँ रहते हैं।
गुमराह हैं अपने मक़सद से मगर चक़ ज़ुबां हो ये कहते हैं ।।
यही है सब कुछ यही है रुतबा इसी से दुनिया में इज़्ज़त है।।
धन माल है तो इज़्ज़त है शानो-शौक़त है ज़माने में ।।
निर्धन को कौन पूछता है आज इस भरे ज़माने में ।।
कर लो ऐशो-इशरत इस दुनिया में
कर लो धन माल की कमाई ।
यही ग़नीमत वक़्त है मिला
इससे बढ़कर नहीं और कोई ख़ुदाई ।।
यही मक़सद है सबसे बढ़िया,
यही सब कुछ हमारा है ।
दुनिया में बग़ैर धन माल के,
और कोई नहीं प्यारा है ।।
इस भूल में पड़ कर अपना,
सारा जीवन बिताते हैं।
हीरे जैसा अनमोल जन्म पाकर,
कौड़ी बदले गँवाते हैं ।।
देखकर उनकी हालत को आरिफ़
बड़ा अफसोस करते हैं ।
युगों के बाद मिला था मानुष-जन्म
उसे यूँही गँवाते हैं ।।
जब तक न मिलें मुर्शिदे-कामिल
नहीं इसका ज्ञान होता है ।
मैं हूँ कौन? क्या है मेरा म़कसद?
नहीं इसका ध्यान होता है ।।
बिगड़ी जन्मों की बन जाती है
पीरे-कामिल के मिलने से ।
जन्मों की आस लगी थी जो
पूरी हो जाती है उनके मिलने से ।।
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