श्री सद्गुरु देवाय नमः
श्री अमर वाणी
(1)
बड़ी ख़ुशक़िस्मती से मिली तुझे यह ज़िन्दगी ।
इस ज़िन्दगी को पाकर कर ले मालिक की बन्दगी ।।
गर न की बन्दगी तो फिर किया ही क्या ।
ऐशो-इशरत में गया वक़्त फिर हाथ आया ही क्या ।।
यह जन्म नहीं मिला यूँही गँवाने के लिये ।
यह ग़नीमत वक़्त मिला है प्रभु को पाने के लिये ।।
(2)
कई जन्मों के पुण्य से पाई मनुषा देह ।
मालिक की कर बन्दगी जन्म सफल कर लेह ।।
बार-बार न पावसें ऐसी उत्तम देह ।
चौरासी से छूटने का, दुर्लभ अवसर है येह ।।
(3)
गुरुमुख की केवल एक चाह है, कि सदा गुरु भक्ति में मन लगा रहे।
और न कोई ख़्याल उठे, केवल नाम की लगन दिल में लगी रहे।।
(4)
दुर्लभ जन्म को पाकर बन्दे, मन में ज़रा विचार कर ।
कौड़ी बदले हीरे जन्म को, यूँही न बरबाद कर ।।
ऐसा जन्म अमोलक पाया, कुछ नेक कमाई कर ले तू ।
भजन प्रभु का करके बन्दे, जीवन सफल बना ले तू ।।
यही है अवसर यही है वेला, नाम प्रभु का ध्या ले तू ।
अन्त में होगा संगी साथी, परलोक का तोशा बना ले तू ।।
(5)
किसलिये दुनिया में आया, समझा नहीं इस राज़ को।
लग गया रोज़ी की फ़िकर में, भूल गया असली बात को।।
छोड़ दे तू फ़िकर अपनी, ज़िकर कर भगवान का।
फ़िकर तेरी आप करेगा, जिसने जामा दिया इन्सान का।।
बन्दगी मालकि की करना, असली तेरा काम था ।
ग़ैर ख्यालों को हटाकर, दिल में बसाना प्रभु-नाम था ।।
चेत जा और जाग जा, है ज़िन्दगी दो चार दिन ।
कर ले नाम भक्ति की कमाई, सँवर जाये तेरा जीवन ।।
(6)
झूठी काया झूठी माया, झूठा यह संसार ।
झूठ-झूठे नेह लगाया, विसरया करतार ।।
किस नाल कीजे दोसती, सब जग चलनहार ।
सत्तनाम का सुमिरण कर ले, भव से हो जाये पार ।।
(7)
दो दिन जग में जीना है, इस पर क्या तू मान करे ।
झूठी काया झूठी माया, झूठा क्या अभिमान करे ।।
धरा रहेगा सब कुछ यहाँ पर, साथ नहीं कुछ जायेगा ।
निकल गया जब समय हाथ से, तलियाँ मल पछतायेगा ।।
चेत ज़रा और नाम सुमिर ले, समय से लाभ उठा ले तू ।
भजन भक्ति में दिल लगाकर, जीवन सफल बना ले तू ।।
(8)
बड़े भाग से मानुख देही पाई ।
नाम सुमिर ले जो चाहे भलाई ।।
विषयों में फँसकर जन्म मत गँवाना ।
नहीं तो पड़ेगा अन्त पछताना ।।
दरगाह में होगी बड़ी शर्मसारी ।
उठायेगी रूह तेरी दुःख कष्ट भारी ।।
मिल साध संगत कर नाम की कमाई ।
कटे जिससे तेरी चौरासी की फाही ।।
(9)
मानुष जन्म दुर्लभ है, बार-बार नहीं पायेगा ।
निकल गया जब समय हाथ से, फिर पाछे पछतायेगा।।
स्वाँस-स्वाँस में नाम सुमिर ले, जन्म सफल हो जायेगा ।
आवागमन का चक्कर छूटे, मुक्ति पदारथ पायेगा ।।
(10)
हुई मालिक की कृपा पाया मानुष जन्म ।
इसमें भक्ति का लाभ उठा फिर न मिले दोबारा जन्म ।।
सच्चा लाभ है मालिक की भक्ति कमा ।
भक्ति करके अपने जीवन को सफल बना ।।
करेगा भक्ति तो पायेगा सच्चे सुख को सदा ।
रहा भक्ति से महरूम उठायेगा दुःख को सदा ।।
अब भी वेला है कर ले मालिक की बन्दगी ।
वरना रोयेगाँ गुज़र जायेगी तेरी ज़िन्दगी ।।
कर ले संतों की संगत बना ले अपनी सफल ज़िन्दगी ।
जीवन उसका धन्य हुआ जिसने की मालिक की बन्दगी ।।
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