Wednesday, January 6, 2016

।। दोहा ।।
श्री आरती-पूजा होय जहाँ, श्री परमहँस विराजमान ।
जेहि घर गुरु की भक्ति है, सो घर बैकुण्ठ समान ।।
भक्ति सुख का मूल है, भक्ति सुख की खान ।
जाके हृदय भक्ति बसै, पावै पद निर्वान ।।
गुरुमुख के मन सदा खुशी, नित सेवा भक्ति की प्यास ।
मनमुख रहे नित झूरता, मन विषयन की आस ।।
जीने से मरना भला, बिसरयो गोबिंद नाम ।
कंचन देह किस काम की, जा मुख नाहीं नाम ।।
यह मन वैरी सबल है, इसके साथी पाँच ।
जो जन सतगुरु शरण पड़े, कबहुँ न लागे आँच ।।
ये तो केवल पाँच हैं, भावें होत पचास ।
जाके सिर पर गुरु धनी, ताको कौन त्रास ।।
सत्तनाम हिरदे बसा, भया पाप का नाश ।
अज्ञान तिमिर सब मिट गया, अन्तर भया प्रकाश ।।
कहा भरोसा देह का, बिनस जाय छिन माहिं ।
बिना भजन भगवान के, काल कर्म भरमाहिं ।।
मिथ्या सब संसार है, साचा हरि का नाम ।
हरि नाम जा घट बसै, पावै सुख बिसराम ।।
सकल सृष्टि का राजा दुःखी, विमुख राम से होय ।
ते जन सुखी संसार में, राम नाम चित्त होय ।।
माया भुलावे सब जग भुलया, विसरया करतारा ।
माया तज भक्ति चित्त लावे, विरला गुरुमुख प्यारा ।।
सार वस्तु है जगत में, पावन हरि का नाम ।
नाम हरि का सिमरते, पूरण हों सब काम ।।
नित ही खुशियाँ मानता, नित सुख उसेक पास ।
और न दिल में चाह कोई, केवल नाम भक्ति की प्यास ।।
हरि नाम जपते रहो, रखो न और की आस ।
जेती आस संसार की, सो सब काल की फास ।।
एक सोच सुखरास है, एक सोच दुखरास ।
क सोच बंधन कटैं, एक सोच गल फास ।।
नाम सोच सुख रास है, काम सोच दुख रास ।
नाम सोच बन्धन कटैं, काम सोच गल फास ।।
काम दाम की प्रीत जग, नित नित होत पुरान ।
राम प्रीत नित ही नई, वेद पुरान परमान ।।
तिमिर अज्ञान सब मिट गया, पाया सन्तों का संग ।
मन में उजाला हो गया, चढ़ा भक्ति का सच्चा रंग ।।
चतुर शिरोमणि सोई जग में, जिस नाम से लिव लगाई।
छोड़ के झूठी ममता जग की, प्रीत प्रभु संग लाई ।।
साचा प्रभु का नाम एक, मिथ्या सब संसार ।
नाम प्रभु का सुमिर ले, भव से हो जाय पार ।।
मोक्ष मुक्ति तुम चाहते हो, तजो कामना खाम ।
मन से इच्छा मेट कर, भजो निरंजन नाम ।।
गुरु किरपा ते मन बसै, साचा हरि का नाम ।
बड़भागी ते जीव हैं, जो सुमिरहिं आठों याम ।।
पांच नियम जो नित करे, जिम में श्रद्धा धार ।
लोक और परलोक के, सतगुरु ज़िम्मेवार ।।
श्री आरती-पूजा सत्संग सेवा, सुमिरण और ध्यान ।
श्रद्धा सहित सेवन करे, निश्चय हो कल्याण ।।

No comments:

Post a Comment