Wednesday, January 6, 2016

(41)
दो चार दिन की ज़िन्दगी मिली थी, मक़सद को अपने भुला दिया ।
दुनिया की झूठी ख्वाहिशों में, जीवन अपना गँवा दिया ।।
गर न की मालिक की बन्दगी, जन्म वृथा चला जायेगा ।
ऐसा अवसर बार-बार न मिले, फिर पीछे पछतायेगा ।।
(42)
बड़े भाग से तुझको, यह मानुष जन्म मिला ।
इससे बढ़कर हुई मालिक की किरपा, सन्तों का संग मिला ।।
अभी समय है नाम भक्ति की कर ले कमाई, जीवन को सफल बनाले ।
जन्मों की बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला ले ।।
(43)
याद रखने के काबिल है, सिर्फ़ एक ही बात ।
प्रभु को याद करना, ये है एक सच्ची बात ।।
अपने मालिक की याद को, जिसने दिल से भुला दिया ।
अपनी हीरे जन्म को उसने, कौड़ी के बदले गँवा दिया ।।
(44)
जब याद तेरी आई तो दिल खुशियों में झूम उठा ।
आज शताब्दी का शुभ जन्म दिवस मनाने को सारा जहां उमड़ पड़ा।
तेरी याद से ही सबके जीवन में बहार आई है।
आज हर एक प्रेमी एक दूजे को देता बधाई है ।
(45)
खुशियों से दिल भर गया, जब याद तुम्हारी आई है।
हर तरफ़ सुहानी रुत है छाई, हर एक के मन में खुशी समाई है ।।
बस एक तमन्ना है दिल में, कि याद प्यारी बनी रहे।
और न दिल में कोई ख़्याल उठे, बस एक लगन लगी रहे ।।
(46)
सन्तों के उपकार का कोई बदला देन पाते हैं ।
ये उनकी ही कृपा है जो बिछुड़ी हुई रूहों को मालिक संग मिलाते हैं।।
ये दास जनम जनम अभारी है जो उन्होंने करम कमाया है।
जिन्होंने अपनी कृपा दृष्टि से ये भक्ति का मारग दरसाया है ।।
(47)
यह दुनिया क्या है जिसपे शैदा ज़माना, इक बाग़ की तस्वीर है।
गुले-मक़सूद हरगिज़ नहीं पा सकते, कोई लाख करे तदबीर है।।
दुनिया की ममता छोड़कर, जो सन्त शरण में आ गया ।
सच्चे नाम की करके कमाई, अपने असली मक़सद को पा गया ।।
(48)
क़ुदरत की रचना में, सत और असत दोनों सामान है ।
ज्ञानवान तो सत चाहते, और असत को चाहते नादान हैं।।
तमाम इल्मों का निचोड़, बस तू ये जान ले ।
दुनिया में किसलिये आया हूँ, इसका राज़ तू जान ले ।।
(49)
मानुष जनम दुर्लभ है, होत न बारम्बार ।
भक्ति कर भगवान की, लीजै जनम सुधार ।।
स्वाँस स्वाँस में नाम जप, भक्ति का धन कमा ले ।
आवागमन का चक्कर छूटे, रूह की हो भलाई;
काल करम का भय मिट जाये, मुक्ति पदारथ पा ले ।।
(50)
वणज करहु वणजारिहु, कर लो नाम की कमाई ।
सच्ची रास परलोक की, अन्त में होय सहाई ।।
स्वाँ स्वाँस में नाम सुमिर लो, सच्चे सुख की खान ।
मानुष जन्म का लाभ यही है, पावै पद निर्वाण ।।

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