Wednesday, January 6, 2016

(31)
जाहो-हशमत चली जाये तो ग़म की जा नहीं ।
धन-सम्पत्ति लुट जाये तो उसकी परवाह नहीं ।।
चला जाये मान रुतबा तो उसका कोई डर नहीं ।
छोड़ जायें सब अकरबा तो उसकी फ़िकर नहीं ।।
छूटे न पाक दामन इक अपने पीरे-कामिल का ।
बचाता है हर मुसीबत से सहारा है हर मुश्किल का ।।
(32)
गुले-मक़सूद पा सकते नहीं, इशरत के दीवाने ।
जिन्हें प्रभु-भक्ति की राह पर, गुज़र जाना नहीं आता ।।
हसरत है दिल में कि पा लें, हम भी मालिक का प्यार ।
वो पा सकते नहीं जिन्हें, ग़ैरियत से हट जाना नहीं आता ।।
(33)
कर्म जैसा करे इन्सान, फल भी वैसा पायेगा ।
बोये आक बबूल तो, आम कहाँ से खायेगा ।।
विषयों में गर चित्त दिया, तो सुख न हरगिज़ पायेगा ।
नाम प्रभु का सुमिर ले प्राणी, मुक्तरूप हो जायेगा ।।
(34)
इक इक स्वाँस की क़ीमत भारी, हीरे मणियों से भरा ।
नाम-भक्ति की कमाई करके, जीवन से अपने सच्चा लाभ उठा ।।
(35)
जीव जैसे कर्म करका है, वैसा ही फल पाता है ।
नेक कर्मों से सुख है मिलता, बुरे कर्मों से दुःख उठाता है।।
नेक व बद से ऊपर उठकर, जो सन्तों की शरण में जायेगा ।
नाम-भक्ति की करके कमाई, सच्चे सुख को पायेगा ।।
यही है सच्चा लक्ष्य इस जीवन का, जो इसी जन्म में हो जायेगा ।
आवागमन का चक्कर मिट जाये, मोक्ष पद को पायेगा ।।
(36)
इस जहां में आकर रहा कोई बशर नहीं।
क्या सोचता है कल की पल की ख़बर नहीं ।।
करना है जो कुछ करले आज कमाई परलोक के लिए ।
खड़ा देख रहा है काल तुझको ले जाने के लिए ।।
(37)
कुछ सोच विचार मन में प्राणी, किसलिए इस जग में आया है।
क्या लक्ष्य है तेरे जीवन का, क्योंकर मानुष तन पाया है।।
लाखों जन्म व्यतीत किये, दुःखों से अब तक छूटा ना ।
जन्म मरण में युग बीते, चौरासी का बन्धन टूटा ना ।।
प्रभु ने की दया अकारण ही, बख्शा ये दुर्लभ मानुष-जनम ।
मोह निद्रा से जाग ज़रा, सत्पुरुषों की कर शरण ग्रहण ।।
सतगुरु शब्द के सुमिरण से, कट जायेगा चौरासी का बन्धन ।
जन्मों से बिछुड़ी आत्मा का, प्रभु से होगा फिर मधुर मिलन ।।
(38)
आज को जो समय तुझको मिला है, वो कल नहीं मिल पायेगा ।
जो करना सो आज ही कर ले, गया वक़्त फिर हाथ न आयेगा ।।
कल के भरोसे पर जिसने, आज को है टाल दिया ।
मन-माया के धोके में आकर, उसने बड़ा नुकसान किया ।।
यही वक़्त है संतों की शरण में आकर, अपना काम बना ले तू ।
भजन-भक्ति की करके कमाई, मानुष-जन्म का लाभ उठा ले तू ।।
(39)
आया था इस जगत में, लेकर एक ही आस ।
भजन करूँगा भक्ति करूँगा, और न दिल में कोई आस ।।
अपने लक्ष्य को भूल गया, रह गयी दिल की दिल में आस ।
यह अवसर फिर कर न मिलेगा, रखो यह विश्वास ।।
करना है तो अब ही करलो, जब तक हैं ये स्वाँस ।
नाम-भक्ति की कमाई करके, पूरी करलो अपनी आस ।।
(40)
नाम रह जायेगा ब़ाकी बस ख़ुद-ए-पाक का ।
नक़्श वो मिट कर रहेगा जो बना है ख़ाक का ।।
जुज़ ख़ुदा-ए-नाम के चैन मिल सकता नहीं ।
गर हो तलब दुनिया की ख़ुदा मिल सकता नहीं ।।
साथ तेरे जायेगा बस प्रभु का नाम ही ।
जिस दुनिया पे तू है फ़िदा वो दर हक़ीक़त है नफ़ी ।।

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