Wednesday, January 6, 2016



सच्चा साथी
नाम के रंग में रंग के मन को, जीवन अपना सफल बना ।
जग के मोह में फँसकर प्राणी! जन्म न अपना व्यर्थ गँवा ।।
मानुष-जन्म अमोलक पाया, बार-बार नहीं पायेगा ।
प्रभु का नाम अगर न सुमिरा, तलियाँ मल पछतायेगा ।।
चेत जा अब भी नाम सुमिर ले, जन्म का सच्चा लाभ उठा ।
नाम के सुमिरण से ही प्राणी! होगा तेरी रूह का भला ।।
झूठे हैं सब जग के धन्धे, काम तेरे नहीं आयेंगे ।
इनमें ही मत जन्म गँवा तू, अन्त न साथ निभायेंगे ।।
अन्त में तेरे काम जो आये, प्रभु का नाम तू हृदय बसा ।
जीवन बाज़ी जीत ले प्यारे! पल-पल प्रभु का नाम ध्या ।।
जिनको कहता है तू अपना, उनमें कोई न तेरा है ।
कुछ दिन का यह साथ है जैसे, पंछी रैन बसेरा है।।
अन्त में होगा कोई न संगी, झूठे हैं ये सब नाते ।
नाम ही सच्चा संगी साथी, उससे प्यार बढ़ा ले ।।
सन्तों के उपदेश को दासा, अपने हृदय बसा ले तू ।
करते हुए व्यवहार जगत के, चित्त में नाम ध्या ले तू ।।
नाम प्रताप से निश्चय ही तू, पायेगा फिर सुख साचा ।
दोनों लोक सँवर जायेंगे, पाकर प्रभु की प्रसन्नता ।।

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