Wednesday, January 6, 2016


क़ुदरत  की रचना
क़ुदरत ने यह रचना रचाई,
सब जीव जन्तु इस धरती पर ये हैं ।
अपने अपने कर्मों के अनुसार,
सब फल भोगने यहाँ आये हैं ।।

कोई सुखी है तो कोई दुःखी,
और कोई ग़मगीन लगता है ।
कोई धनवान तो कोई गरीब,
कोई मसकीन लगता है।।

कोई आमिल है तो कोई फ़ाज़िल,
कोई बे-इल्म दुनिया में फिरता है।
मगर अपनी-अपनी प्रारब्ध अनुसार,
मालिक सबको रोज़ी देता है ।।

एक ही मालिक के बन्दे हैं,
फिर क्यों दुःखी सुखी रहते हैं ।
एक ही धरती पर रहने वाले,
फिर क्यों इतने कष्ट-क्लेश सहते हैं ।।

देख कर दुनिया की ऐसी हालत को,
सन्त यह वचन फ़रमाते हैं।
है यह सब कर्मों का खेल,
जैसे पहले किये वैसे ही फल पाते हैं ।।

अगर कोई चाहे इन्सां कि,
मेरी तक़दीर बदल जाये ।
मैं दुःखी से सुखी हो जाऊँ,
मुझे दुःख बिल्कुल न आये ।।

ऐसा हो सकता है तभी,
जब कि सन्तों की संगत में आ जायें।
अपने दुःख निवारण का,
उनसे कोई साधन अपनायें ।।

बदल जायेगी तक़दीर उसकी,
जो शरण सत्पुरुषों की आयेगा ।
करेगा नाम का सुमिरण,
दो दुःखी से सुःखी हो जायेगा ।।

सुख सबको ही प्यारा है,
सब लोग सुख ही चाहते हैं ।
मगर कर्म करते हैं दुःखों वाला,
तो फिर दुःख ही पाते हैं ।।

महापुरुष जीव के मन का,
काँटा बदल देते हैं।
बुरे कर्मों से हटा कर,
नेक कर्मों में बदल देते हैं ।।

क़ुदरत ने किया यह प्रबन्ध,
सन्त परोपकारी धराधाम पर आते हैं।
लगाकर जीवों को भक्ति-पथ पर,
सद् मार्ग उनको दिखाते हैं।।

भक्ति की राह पे चल कर,
जीव दुःखी से सुखी हो जाते हैं ।
बन्धन छूट जाता है कर्मों का,
मोक्ष पद को पाते हैं ।।

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