दुनिया एक मुसाफ़िरख़ाना
यह घर नहीं तेरा मुसाफ़िरख़ाना है,
गौर से सुन ऐ इन्सां ।
चन्द दिन के लिये आया है,
तू बन कर यहाँ मेहमां ।।
चार दिन की मुसाफ़िरी,
फिर वापस घर को जायेगा ।
जो किये आमाल यहाँ पे,
फल उन्हीं का साथ ले जायेगा ।।
गर किये आमाल अच्छे,
तो प्रभु के मन को भायेगा ।
विषयों में गर दिल लगाया,
तो बहुत दुःख उठायेगा ।।
पर उपकारी सन्त तुझे,
याद कराते हैं अपने काम को ।
सफ़र करते याद रखना,
मालिक के सच्चे नाम को ।।
मोह ममता के जाल से,
दामन को बचाये रखना तुम ।
सतगुरु की शिक्षा पा कर,
नाम प्रभु का जपना तुम ।।
पकड़ लिया जब दामन गुरु का,
फिर कभी दुःख नहीं पायेगा ।
अन्त में होगा संगी साथी,
घर अपने तुम्हें पहुँचायेगा ।।
ज़िन्दगी का यह सफ़र जो तेरा,
सुख रूप बन जायेगा ।
आया था जिस काम की ख़ातिर,
वह काम तेरा बन जायेगा ।।
इसी तरह सन्तों की नसीहत को,
अमल में जो लायेगा ।
करके अपने लक्ष्य को पूरा,
खुशी-खुशी घर जायेगा ।।
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