Wednesday, January 6, 2016




अपने मक़सद की पहचान
कितने हैं दुनिया में लोग जो ऐसे ज़िन्दगी बसर करते हैं ।
क्या वो ज़िन्दगी में मक़सद के पहचानने का दम भरते हैं।।
बड़े बड़े मुदब्बिर धनी और पंडित भी यहाँ रहते हैं।
गुमराह हैं अपने मक़सद से मगर चक़ ज़ुबां हो ये कहते हैं ।।
यही है सब कुछ यही है रुतबा इसी से दुनिया में इज़्ज़त है।।
धन माल है तो इज़्ज़त है शानो-शौक़त है ज़माने में ।।
निर्धन को कौन पूछता है आज इस भरे ज़माने में ।।
कर लो ऐशो-इशरत इस दुनिया में
कर लो धन माल की कमाई ।
यही ग़नीमत वक़्त है मिला
इससे बढ़कर नहीं और कोई ख़ुदाई ।।
यही मक़सद है सबसे बढ़िया,
यही सब कुछ हमारा है ।
दुनिया में बग़ैर धन माल के,
और कोई नहीं प्यारा है ।।
इस भूल में पड़ कर अपना,
सारा जीवन बिताते हैं।
हीरे जैसा अनमोल जन्म पाकर,
कौड़ी बदले गँवाते हैं ।।
देखकर उनकी हालत को आरिफ़
बड़ा अफसोस करते हैं ।
युगों के बाद मिला था मानुष-जन्म
उसे यूँही गँवाते हैं ।।
जब तक न मिलें मुर्शिदे-कामिल
नहीं इसका ज्ञान होता है ।
मैं हूँ कौन? क्या है मेरा म़कसद?
नहीं इसका ध्यान होता है ।।
बिगड़ी जन्मों की बन जाती है
पीरे-कामिल के मिलने से ।
जन्मों की आस लगी थी जो
पूरी हो जाती है उनके मिलने से ।।





सन्तों का उपकार
दुनिया की अवस्था देखकर एक प्रेमी,
अपने दिल का हाल सुनाता है।
देखकर ये चहल पहल वो,
अपने मन को समझाता है।।
बचपन में कुछ समझ न थी,
वो खेल कूद में निकल गया ।
बाल अवस्था आई तो दिल में,
पढ़ने लिखने का शौक हुआ ।।
कुछ वक़्त गुज़रा तो दिल में,
कुछ-कुछ ख़्याल उठने लगे।
किस तरफ़ से ये लोग आये हैं
और किस तरफ़ ये जाने लगे ।।
कोई जाता है पश्चिम कोई पूरब
की तरफ़ को जाता है ।
कोई जाता है उत्तर की और
कोई दक्खिन को भागा जाता है ।।
एक से पूछा दूसरे से पूछा
क्यों दौड़-धूप तुम करते हो।
क्या मतलब है इस भाग दौड़ का
क्यों इतना घबराते हो ।।
सबका यही जवाब है मिलता,
हम अपने काम को जाते हैं ।
सारा दिन काम हैं करते
फिर रोज़ी का ढंग बनाते हैं ।।
दिन भर हम काम हैं करते
रात को बच्चों को खिलाते हैं ।
सारे दिन के थके मांदे
घर में आराम पाते हैं ।।
इसी तरह करते करते
जवानी से बुढ़ापा आ गया ।
शरीर भी दुर्बल हो गया और
काल का परवाना आ गया ।।
स्वाँसों की पूँजी खत्म हुई,
वक़्त आख़िरी आ गया ।
घर वाले सब देखते रह गये,
काल उसको ले गया ।।
कहाँ से आया था कहाँ चला गया है,
ये न किसी को ख्याल हुआ ।
साथ में क्या लाया था अब क्या ले गया,
ये भी न कुछ ख़्याल हा ।।
अन्दर से ये ख़्याल उठा कि
कुदरत ने इसको यहाँ क्यों भेजा था?
किस मतलब के लिये यहां आया था
किस काम के लिये यहाँ भेजा था?
संतों की बाणी ये बतलाती है कि
ये आया था किसी ख़ास काम के लिये।
जन्मों से इसकी रूह भटक रही थी
उसको आज़ाद कराने के लिये ।।
ये मानुष चोला मिला था इसलिये कि
इसमें मालिक की भक्ति करता ।
भक्ति करके भगवान की ये
मानुष-जन्म से लाभ उठाता ।।
यहाँ भी आकर इसने कोई
इधर ध्यान ही नहीं दिया ।
माया के ग़लवे में आकर इसने,
अपने काम को भुला ही दिया ।।
आख़िर को नतीजा क्या होगा जो
इसकी रूह को बन्धन पड़ जायेगा ।
बड़ी मुश्किल से ये छूटा ता फिर
चौरासी का फंदा पड़ जायेगा।।
अमूमन जो जीव दुनिया में आते हैं
माया के ग़लवे में आ जाते हैं।
जिस मक़सद के लिये वो आते हैं
उसको दिल से बिल्कुल भुला देते हैं ।।
क़ुदरत की तरफ़ से सन्त-महापुरुषों का
दुनिया में ज़हूर होता है।
भूली-भटकी रूहों को माया के
ग़लबे से आज़ाद कराना होता है।।
भाग से जो जीव इनकी
शरण में आ जाते हैं ।
भक्ति का सद् मार्ग दिखलाकर
बन्धन से आज़ाद कराते हैं ।।
ऐ भोले प्राणी तू भी संतों की शरण में आ
और अपने काम को याद कर ।
जिस मक़सद के लिये यहाँ आया है,
उसके लिये फ़रियाद कर ।।
सन्त-महापुरुष दया करके तुझ को,
वो रास्ता दिखलायेंगे ।
जिस पर चलने से तेरा काम बनेगा,
और अपने घर पहुँचायेंगे ।।
।। दोहा ।।
श्री आरती-पूजा होय जहाँ, श्री परमहँस विराजमान ।
जेहि घर गुरु की भक्ति है, सो घर बैकुण्ठ समान ।।
भक्ति सुख का मूल है, भक्ति सुख की खान ।
जाके हृदय भक्ति बसै, पावै पद निर्वान ।।
गुरुमुख के मन सदा खुशी, नित सेवा भक्ति की प्यास ।
मनमुख रहे नित झूरता, मन विषयन की आस ।।
जीने से मरना भला, बिसरयो गोबिंद नाम ।
कंचन देह किस काम की, जा मुख नाहीं नाम ।।
यह मन वैरी सबल है, इसके साथी पाँच ।
जो जन सतगुरु शरण पड़े, कबहुँ न लागे आँच ।।
ये तो केवल पाँच हैं, भावें होत पचास ।
जाके सिर पर गुरु धनी, ताको कौन त्रास ।।
सत्तनाम हिरदे बसा, भया पाप का नाश ।
अज्ञान तिमिर सब मिट गया, अन्तर भया प्रकाश ।।
कहा भरोसा देह का, बिनस जाय छिन माहिं ।
बिना भजन भगवान के, काल कर्म भरमाहिं ।।
मिथ्या सब संसार है, साचा हरि का नाम ।
हरि नाम जा घट बसै, पावै सुख बिसराम ।।
सकल सृष्टि का राजा दुःखी, विमुख राम से होय ।
ते जन सुखी संसार में, राम नाम चित्त होय ।।
माया भुलावे सब जग भुलया, विसरया करतारा ।
माया तज भक्ति चित्त लावे, विरला गुरुमुख प्यारा ।।
सार वस्तु है जगत में, पावन हरि का नाम ।
नाम हरि का सिमरते, पूरण हों सब काम ।।
नित ही खुशियाँ मानता, नित सुख उसेक पास ।
और न दिल में चाह कोई, केवल नाम भक्ति की प्यास ।।
हरि नाम जपते रहो, रखो न और की आस ।
जेती आस संसार की, सो सब काल की फास ।।
एक सोच सुखरास है, एक सोच दुखरास ।
क सोच बंधन कटैं, एक सोच गल फास ।।
नाम सोच सुख रास है, काम सोच दुख रास ।
नाम सोच बन्धन कटैं, काम सोच गल फास ।।
काम दाम की प्रीत जग, नित नित होत पुरान ।
राम प्रीत नित ही नई, वेद पुरान परमान ।।
तिमिर अज्ञान सब मिट गया, पाया सन्तों का संग ।
मन में उजाला हो गया, चढ़ा भक्ति का सच्चा रंग ।।
चतुर शिरोमणि सोई जग में, जिस नाम से लिव लगाई।
छोड़ के झूठी ममता जग की, प्रीत प्रभु संग लाई ।।
साचा प्रभु का नाम एक, मिथ्या सब संसार ।
नाम प्रभु का सुमिर ले, भव से हो जाय पार ।।
मोक्ष मुक्ति तुम चाहते हो, तजो कामना खाम ।
मन से इच्छा मेट कर, भजो निरंजन नाम ।।
गुरु किरपा ते मन बसै, साचा हरि का नाम ।
बड़भागी ते जीव हैं, जो सुमिरहिं आठों याम ।।
पांच नियम जो नित करे, जिम में श्रद्धा धार ।
लोक और परलोक के, सतगुरु ज़िम्मेवार ।।
श्री आरती-पूजा सत्संग सेवा, सुमिरण और ध्यान ।
श्रद्धा सहित सेवन करे, निश्चय हो कल्याण ।।


जीवन का लक्ष्य

जब फूल खुशी से मुसकाया,
तो माली ने उसको नोच लिया ।
यही हाल होगा गुंचा का कल,
जो आज फूल का हाल हुआ ।।
तेरे साथ भी ऐ भोले प्राणी,
इक दिन ऐसा ही होना है।
काल रूपी माली के हाथों,
तूने भी जीवन खोना है।।
हर एक चीज़ की मियाद रखी,
क़ुदरत ने अलग अलग जानकर ।
नहीं कोई मियाद मगर तेरी,
ऐ बशर! तू दिल में पहचान कर ।।
क़ुदरत ने हर इक वस्तु के,
ज़िम्मे कुछ काम लगाया है।
उस काम की खातिर उसने भी,
गुण वैसा ही अपनाया है ।।
दुनिया में आकर हर इक शै,
अपना काम कर जाती है।
अपनी तासीर मुताबिक़ वह,
रंगो-बू फैला जाती है ।।
तेरा नाम है अशरफ़-अल-मख़लूक़ात,
किरदार क्या होना चाहिये?
रुतबा जग में क्या तेरा है,
क्या काम तेरा होना चाहिये?
कभी यह भी दिल में सोचा है,
तू आया जग में किस ख़ातिर?
क्या हासिल तुझको करना है,
और नर तन मिला हैकिस ख़ातिर?
दुनिया के बखेड़ों में फँसकर,
अपने मक़सद को न कभी समझा ।
जिन्हें छोड़ के तू जाना है,
उन्हीं के मोह में रहा तू उलझा ।।
धन और पदारथ दुनिया के,
और सगे सम्बन्धी भी सारे ।
इनमें नहीं कुछ भी तेरा है,
सब झूठे नाते हैं प्यारे ।।
जब अन्त काल आ जाता है,
नहीं की भी साथ निभाता है।
मालिक का नाम फ़कत प्राणी!
उस समय काम में आता है ।।
अब सोच समझ ले ऐ नादां!
फिर समय न हाथ में आयेगा ।
चुग गयीं खेत जब चिड़ियाँ तो,
तलियाँ मल मल पछतायेगा ।।
तेरी स हालत को लख कर,
है प्रभु को तुझ पे तरस आता ।
वह सच्ची राह दिखाने को,
सन्तों का रूप है धर आता ।।
तेरे इस जीवन को जो मक़सद है,
सत्पुरुष तुझे जतलाते हैं ।
अपने सुन्दर उपदेशों से,
हक़ की पहचान कराते हैं।।
दुर्लभ मानुष तन को पाकर,
दुर्लभ वस्तु को पाना है।
मालिक की भक्ति की न अगर,
तो समय को व्यर्थ गँवाना है ।।
इस दुर्लभ देही की महिमा,
 सन्तों ग्रन्थों ने उचारी है।
इस जीवन की जो करता क़द्र,
क़ीमत उसे मिलती भारी है।।
अनमोल जन्म को पाकर भी,
गर प्रभु का भजन कमाया ना ।
सन्तों की शरण में आकर के,
लोक परलोक बनाया ना ।।
तो अन्त में तुझको ऐ प्राणी!
होगी बहुत ही परेशानी ।
मालिक की दरगाह में तुझको,
बेहद होगी फिर पशेमानी ।।
इसलिये काम तेरा जग में,
केवल प्रभु की भक्ति करना ।
सिवा इसके दीग़र कामों में,
तू चित्त को कभी न धरना ।।
बन्दे से ख़ुदा बनना तुझको,
है लक्ष्य यही जिसे पाना है ।
और शब्द में सुरत मिला करके,
मिल हक़ में हक़ हो जाना है ।।
यह लक्ष्य तभी होगा हासिल,
जब गुरु का दास बन जायेगा ।
तब होगा जीवन सफल तेरा,
गुण सदा गुरु के गायेगा ।।


सच्चा साथी
नाम के रंग में रंग के मन को, जीवन अपना सफल बना ।
जग के मोह में फँसकर प्राणी! जन्म न अपना व्यर्थ गँवा ।।
मानुष-जन्म अमोलक पाया, बार-बार नहीं पायेगा ।
प्रभु का नाम अगर न सुमिरा, तलियाँ मल पछतायेगा ।।
चेत जा अब भी नाम सुमिर ले, जन्म का सच्चा लाभ उठा ।
नाम के सुमिरण से ही प्राणी! होगा तेरी रूह का भला ।।
झूठे हैं सब जग के धन्धे, काम तेरे नहीं आयेंगे ।
इनमें ही मत जन्म गँवा तू, अन्त न साथ निभायेंगे ।।
अन्त में तेरे काम जो आये, प्रभु का नाम तू हृदय बसा ।
जीवन बाज़ी जीत ले प्यारे! पल-पल प्रभु का नाम ध्या ।।
जिनको कहता है तू अपना, उनमें कोई न तेरा है ।
कुछ दिन का यह साथ है जैसे, पंछी रैन बसेरा है।।
अन्त में होगा कोई न संगी, झूठे हैं ये सब नाते ।
नाम ही सच्चा संगी साथी, उससे प्यार बढ़ा ले ।।
सन्तों के उपदेश को दासा, अपने हृदय बसा ले तू ।
करते हुए व्यवहार जगत के, चित्त में नाम ध्या ले तू ।।
नाम प्रताप से निश्चय ही तू, पायेगा फिर सुख साचा ।
दोनों लोक सँवर जायेंगे, पाकर प्रभु की प्रसन्नता ।।

क़ुदरत  की रचना
क़ुदरत ने यह रचना रचाई,
सब जीव जन्तु इस धरती पर ये हैं ।
अपने अपने कर्मों के अनुसार,
सब फल भोगने यहाँ आये हैं ।।

कोई सुखी है तो कोई दुःखी,
और कोई ग़मगीन लगता है ।
कोई धनवान तो कोई गरीब,
कोई मसकीन लगता है।।

कोई आमिल है तो कोई फ़ाज़िल,
कोई बे-इल्म दुनिया में फिरता है।
मगर अपनी-अपनी प्रारब्ध अनुसार,
मालिक सबको रोज़ी देता है ।।

एक ही मालिक के बन्दे हैं,
फिर क्यों दुःखी सुखी रहते हैं ।
एक ही धरती पर रहने वाले,
फिर क्यों इतने कष्ट-क्लेश सहते हैं ।।

देख कर दुनिया की ऐसी हालत को,
सन्त यह वचन फ़रमाते हैं।
है यह सब कर्मों का खेल,
जैसे पहले किये वैसे ही फल पाते हैं ।।

अगर कोई चाहे इन्सां कि,
मेरी तक़दीर बदल जाये ।
मैं दुःखी से सुखी हो जाऊँ,
मुझे दुःख बिल्कुल न आये ।।

ऐसा हो सकता है तभी,
जब कि सन्तों की संगत में आ जायें।
अपने दुःख निवारण का,
उनसे कोई साधन अपनायें ।।

बदल जायेगी तक़दीर उसकी,
जो शरण सत्पुरुषों की आयेगा ।
करेगा नाम का सुमिरण,
दो दुःखी से सुःखी हो जायेगा ।।

सुख सबको ही प्यारा है,
सब लोग सुख ही चाहते हैं ।
मगर कर्म करते हैं दुःखों वाला,
तो फिर दुःख ही पाते हैं ।।

महापुरुष जीव के मन का,
काँटा बदल देते हैं।
बुरे कर्मों से हटा कर,
नेक कर्मों में बदल देते हैं ।।

क़ुदरत ने किया यह प्रबन्ध,
सन्त परोपकारी धराधाम पर आते हैं।
लगाकर जीवों को भक्ति-पथ पर,
सद् मार्ग उनको दिखाते हैं।।

भक्ति की राह पे चल कर,
जीव दुःखी से सुखी हो जाते हैं ।
बन्धन छूट जाता है कर्मों का,
मोक्ष पद को पाते हैं ।।

अपनी मंज़िल
दुनिया की हालत को देख कर,
बन्दे तू जान जायेगा ।
न कोई आया है साथ में,
न कोई तेरे साथ जायेगा ।।

थोड़ा ही वक़्त मिला था तुझको,
अपना काम करने के लिये ।
बिछुड़ी हुई रूह को
अपने मालिक के संग मिलाने के लिये ।।

झूठी ममता में पड़ कर,
अपने काम को तू भूल गया।
जाना था किस तरफ़,
और चला किधर गया ।।

मोह ममता की नींद में तू,
इतना ग़ाफिल हो गया ।
सोचा न अपनी मंज़िल को,
कि सफ़र कितना लम्बा है मेरा ।।

गर न किया तय अपना सफ़र,
तो दूरी और बढ़ जायेगी ।
कई जन्मों से भटकी तेरी रूह,
फिर दोबारा भटक जायेगी ।।

होश में आ ज़रा चेत जा,
पूछ ले अपनी मंज़िल का रास्ता ।
सत्पुरुषों की शरण में आकर,
तय कर ले अपना रास्ता ।।

सत्पुरुष तेरी मंज़िल को,
आसान बना देंगे ।
गर चलेगा उनकी राहनुमाई में,
वह मंज़िल तक पहुँचा देंगे ।।

यही है केवल एक रास्ता,
जो सत्पुरुष बतलाते हैं।
भूली भटकी रूहों को,
सद् मार्ग दिखलाते हैं ।।

भाग से मिल जायें सतगुरु,
तो बड़ी खुशकिस्मती होती है।
कट जाता है आवागमन का चक्कर,
और मुक्ति मिल जाती है ।।

वही काम है तेरा दास,
जो इस जन्म में हो जायेगा ।
सतगुरु की शरण में आकर,
परमातम से मेल हो जायेगा ।।

रूह की पहचान
मिट्टी के पुतले पर क्यों करता,
तू इतना अभिमान है ।
निकल गयी जब रूह इससे,
तो बिल्कुल बेजान है ।।

दिल में भरा ग़रूर इसके,
नहीं मेरा जैसा कोई बलवान है।
निकल गयी तब जान इस पुतले से,
तो मिट्टी के समान है ।।

दुनिया में नहीं समझता,
मेरे जैसा कोई बुद्धिमान है।
परवाज़ जब कर गयी रूह,
तो ख़ाक की ढेरी यह नादान है ।।

कौन सी वस्तु है इसकी अपनी,
जिसपे करना चाहिये मान है ।
अपनी वस्तु रह है असली,
जिसकी करनी इसे पहचान है ।।

रूह की पहचान करके अपने लक्ष्य को पाना,
सन्तों का यह फ़रमान है।
नाम के सुमिरण से रूह पाक़ होती,
फिर मिले इसे भगवान है।।

सन्तों की मान कर नसीहत,
कर्म करता जो इन्सान है।
कल्याण उसकी रूह का होता,
जग में ऊँची शान है ।।

अन्तरात्मा की पुकार
आ गया जिसके दिल में,
पवित्र और पाक़ ख़्याल ।
मैं भी उस मालिक की अंश हूँ,
होगा कभी मेरा विसाल ।।
ख़्याल जब ऐसा उसके,
दिल में घर कर गया ।
तो अपने अंशी की मुहब्बत में,
उसका दिल यूँ भर गया ।।

बूँद जब सागर में थी,
तो खुशियों में हरदम थी झूमती ।
अलग जब हुई सागर से,
तो दुःखों के घेरे में आ पड़ी ।।

यही हाल है आत्मा का,
जो परमात्मा से जुदा हुई ।
न चैन आया उसको कभी,
न ही कभी खुशी मिली ।।

भाग से जब सतगुरु मिले,
तो दुःखों से किनारा हो गया ।
रस्ता वह बता दिया,
जिससे सच्चा सहारा मिल गया ।।

नाम और भक्ति का सद् मार्ग दिखलाकर,
सतगुरु यह कर्म कमाते हैं ।
यही है उनकी सच्ची रहमत जो,
बिछुड़ी रूहों को प्रियतम संग मिलाते हैं ।।



अपना काम
दुनिया के धन्धों में यह प्राणी,
इतना मशग़ूल रहता है।
न आता है याद काम अपना,
न दिल को आराम आता है।।
साथ जाने वाली वस्तु से,
नहीं यह प्यार करता है।
जिनके पीछे इतना फ़िदा होता,
उनमें न कोई साथ जाता है।।
मिलें न जब  जब तलक सतगुरु पूर्ण,
मोह-माया के ख़्याल भरपूर होते हैं।
न चैन आता है रूह को,
न ग़म दिल के दूर होते हैं ।।
प्रभु का सच्चा नाम है साथी,
जो अन्त में साथ जाता है।
काल से निर्भय हकर,
दरगाह में मान पाता है ।।

सच्चा धन
बहुत धनमाल इकट्ठा किया,
अन्त में कुछ साथ न गया ।
यह धन दौलत आख़िर साथ न जानी है।।

बहुत परिवार बनाया,
मोह के बन्धन में फँसा ।
आख़िर किसी ने भी नहीं निभानी है ।।

मान मर्तबा भी पाया,
आख़िर वह भी काम न आया ।
अन्त में होती बहुत परेशानी है।।

दोस्त मित्र बनाये,
मुश्किल में कोई काम न आये ।
आख़िर में होती बड़ी हैरानी है ।।

सन्त देते हैं  दुहाई,
कर लो सच्चे नाम की कमाई ।
अन्त समय यही तुम्हारे काम आनी है ।।


दुनिया एक मुसाफ़िरख़ाना
यह घर नहीं तेरा मुसाफ़िरख़ाना है,
गौर से सुन ऐ इन्सां ।
चन्द दिन के लिये आया है,
तू बन कर यहाँ मेहमां ।।

चार दिन की मुसाफ़िरी,
फिर वापस घर को जायेगा ।
जो किये आमाल यहाँ पे,
फल उन्हीं का साथ ले जायेगा ।।

गर किये आमाल अच्छे,
तो प्रभु के मन को भायेगा ।
विषयों में गर दिल लगाया,
तो बहुत दुःख उठायेगा ।।

पर उपकारी सन्त तुझे,
याद कराते हैं अपने काम को ।
सफ़र करते याद रखना,
मालिक के सच्चे नाम को ।।

मोह ममता के जाल से,
दामन को बचाये रखना तुम ।
सतगुरु की शिक्षा पा कर,
नाम प्रभु का जपना तुम ।।

पकड़ लिया जब दामन गुरु का,
फिर कभी दुःख नहीं पायेगा ।
अन्त में होगा संगी साथी,
घर अपने तुम्हें पहुँचायेगा ।।

ज़िन्दगी का यह सफ़र जो तेरा,
सुख रूप बन जायेगा ।
आया था जिस काम की ख़ातिर,
वह काम तेरा बन जायेगा ।।

इसी तरह सन्तों की नसीहत को,
अमल में जो लायेगा ।
करके अपने लक्ष्य को पूरा,
खुशी-खुशी घर जायेगा ।।

मन पर नियन्त्रण
चंचल मन नहीं स्थिर रहता, लाख कोई समझाये ।
गुरु शब्द का चाबुक लागे, तब यह वश में आये ।।
बड़े बड़े शूर और योद्धा, इससे वे घबरायें ।
दुनिया पर जो विजय हैं पाते, इससे भय वे खायें ।।
रावण जैसा सूरमा देखे, जिनसे काल बलि था डरता ।
मन के मारे वह भी मर गये, मन पर वश न चलता ।।
कौन है ऐसा दुनिया में, जो मन को मार भगावे?
जन्म-जन्मों की दुखिया रूह का, इससे पीछा छुड़ावे?
पारब्रह्म पूर्ण सतगुरु, धराधाम पर आते।
अपना नाम का देकर अंकुश, मन पर वार लगाते।।
जो कोई इनकी शरण में आये, युक्ति हैं बतलाते ।
सुमिरण-ध्यान, सेवा सत्संग, ये नियम हैं सिखलाते ।।
इन पर जो भी अमल है करता, उसका मन वश आवे ।
रूह को मिले सच्ची शान्ति, परम आनन्द को पावे ।।
ऐसा जन्म अमोलक मानुष तन, बार-बार नहीं पावे ।
सतगुरु नाम को जप ले प्राणी, बहुर जन्म नहीं आवे ।।
सतगुरु जी जो रहमत होवे, तब यह अवसर मिलता ।
जन्म-जन्म से भटका प्राणी, प्रियतम संग है मिलता ।।
ऐसे सतगुरुदेव के, मैं बार-बार बलि जाउँ ।


जिनकी किरपा दृष्टि से, मैं भवसागर तक जाऊँ ।।
(61)
लख चौरासी भ्रमते-भ्रमते, दुर्लभ देह है पाई ।
मोह निद्रा से जाग ज़रा, प्रभु मिलन की बारी आई ।।
सन्तों की संगति में आकर, नाम भक्ति का धन कमा ले ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला ले ।।
(62)
दीवाली की बाहरी खुशियों में, सब लोग मशग़ूल हैं।
दिल से मालिक के नाम को भुलाकर, सच्ची खुशियों से महरूम हैं ।।
सही मायनों में सच्ची दीवाली उसकी है,
जिसने सच्चे नाम से लिव लगाई है।
छोड़ के झूठी ममता जग की,
मालिक के नाम की प्रीत दिल में बसाई है ।।
(63)
आये हो जिस काम को, कर लो अपना काम ।
दोनों लोक सँवर जायेंगे, दरगह में पाओगे मान ।।
काम अपनी यही है, कर लो भजन भक्ति की कमाई ।
जो आत्मा परमात्मा में मिल जाये, सब दुःखों से हो रिहाई ।।
(64)
किस काम के लिये आया, किसलिये मिली यह ज़िन्दगी ।
ज़रा स पर तू कुछ विचार कर, यूँ चली न जाये रायेगाँ ज़िन्दगी ।।
सन्तों सत्पुरुषों की संगति में आकर, इस पर विचार कर ले ।
नाम भक्ति की कमाई करके, अपनी रूह का सुधार कर ले ।।
(65)
रेत की दीवार सम, नश्वर सकत संसार है।
थिर यहाँ कुछ है नहीं, जो कुछ है चालनहार है।।
एक प्रभु का नाम सच्चा, परम सुख का सार है।
जिसके दिल में बस गया, उसका बेड़ा पार है ।।
(66)
बड़े भागों से मानुष जन्म मिला, बार बार नहीं पाओगे ।
इसमें अपना काम बना लो, वरना फिर पछताओगे ।।
सन्तों की शरण में कर, नाम भक्ति का धन कमा लो ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला लो ।।
(67)
अगर तू चाहता है खुशियों से हमेशा रहूँ शाद ।
तो एक दम भूले नहीं तेरे दिल सेप्रभु की याद ।।
प्रभु की याद से ज़िन्दगी सँवर जायेगी ।
ग़म चिन्ता से होगा बरी सुख शान्ति दिल में भरी रहेगी ।।
(68)
रहो जग में रखो सुरति गगन में, रंगो मन अपना भक्ति की लगन में ।
करो दुनिया के काम बेशक, न दुनिया को बसाओ अपने मन में ।
रहो जैसे जहाँ हो जी तुम्हारा, मगर गफ़लत न हो हरि के भजन में ।
मुहब्बत मत बढ़ाओ झूठे जग से, रहो कमल की न्याई इस चमन में ।।
(69)
एक रतन है इस जहां में जो मिलता बारम्बार नहीं ।
ज्यों फूल गिरा जब डाली से, फिर होता वो गुलज़ार नहीं ।।
इस रतन की क़ीमत भारी, जानत लोग गँवार नहीं ।
काँच किरिच बदले में लेवें, जपते हर हर सार नहीं ।।
(70)
दुनिया में हर एक इंसान, सुख और शान्ति का तलबगार है।
मगर मिलता नहीं उसे सुख, वो दुख और गम से बेज़ार है ।।
सही मायनों में उस गुरुमुख के, दिल में खुशी समाई है ।
जिसने जग की तृष्णा छोड़कर, नाम से लिव लगाई है ।।
(71)
मानुष जन्म को पाकर बन्दे, कर ले अपना काम ।
फिर पीछे पछतायेगा, जब निकल जायेंगे प्राण ।।
नाम भक्ति की कमाई करके, पूरा कर ले काम ।
आवागमन का चक्कर छूटे, तेरी रूह का हो कल्याण ।।
(72)
दुनिया में हर एक इन्सान, सुख शान्ति का तलबगार है।
करता है यत्न बहुत, पर वो रहता बेक़रार है ।।
अपने ख्यालों को छोड़कर, जो सन्तों की शरण में आ गया ।
 भक्ति की सच्ची कमाई करके, वो भरपूर सुख को पा गया ।।
(72)
खूबी-ए-किस्मत से तुजे जामा मिला इन्सान का,
अपने लक्ष्य को समझकर भजन कर भगवान का ।
भजन भक्ति से हो जायेगा तेरी रूह का कल्याण,
आवागमन मिट जायेगा पायेगा पद निर्वाण ।।
(72)
सच्ची खुशियों को वो पाते हैं,
जो अपने दिल में राम को बसाते हैं।
झूठी दुनिया की ममता छोड़ करके,
जो प्रभु नाम से चित्त लगाते हैं ।
(75)
कर्म ऐसा होना चाहिये जि जीवन में खुशहाल हो जाये ।
सन्तों की संगत और भक्ति की कमाई से
परलोक भी बहाल हो जाये ।।
(76)
खाओ पीओ खुशियाँ मनाओ, पर बात न भूलो एक ।
श्री आरती-पूजा, सत्संग, सेवा, सुमिरण-ध्यान नित करो,
चाहे बाधा पड़े अनेक ।।

(51)
बड़े भागों से तुझको, यह मानुष जन्म है मिला ।
यह दुर्लभ अवसर मिला है, इसको यूँही न गँवा ।।
संतों की संगति में आकर, नाम और भक्ति का सच्चा धन कमा ।
न कर देर इसमें, जल्दी से ले अपना काम बना ।।
नाम और भक्ति की कमाई कर ले, जन्म सफल हो जायेगा ।
आवागमन का चक्कर मिट जाये, मुक्ति पदारथ पायेगा ।।
(52)
सेवा गुरु-दबार की, खुशनसीप ही पाते हैं ।
नेक नाम भी होता है, जन्म सफल कर जाते हैं ।।
(53)
आदमी का जिस्म क्या है मानिंद पानी का इक बुलबुला ।
चंद स्वाँस की ज़िन्दगी है इसमें भजन भक्ति का लाभ उठा ।।
मानुष जन्म का बार बार ऐसा अवसर फिर मिलेगा नहीं ।
प्रभु भक्ति की कमाई कर ज़िन्दगी का असली मक़सद है यही ।।
(54)
दुनिया में तू आया बन्दे वणज की ख़ातिर, कर ले वणज खरा ।
सोच समझकर सौदा करना, यह बाज़ार है ख़ूब सजा ।।
तेरे पास है स्वाँसों की पूँजी, इससे काम चलाना है ।
निख परख कर सौदा करना, अगर कुछ लाभ उठाना है।
ऐसा सौदा भूल न करना, जिससे होवे हानि भारी ।
कई मुद्दत के बाद ये अवसर मिला है, फिर मिले न दूजी बारी ।।
चमकत दमक की देख के चींजें, इस पे धन न लुटाना ।
प्रभु नाम का सुमिरण करके, सच्चा धन कमाना ।।
ऐसा सच्चा सौदा कर ले, जो परलोक में तेरे संग जाये ।
सच्चे नाम की कर ले कमाई, सहु देखे पतियाये ।।
(55)
लाखों प्रेमी भक्त, रहते हैं हरिद्वार ।
क्या कोई दावा कर सके, पहुँचा हो हरि-द्वार ।।
हरिद्वार में खुल गया- आज गुरु का द्वार ।
सहजे-सहजे पहुँचेंगे, सब प्रेमी हरि के द्वार ।।
(56)
बड़े भागों से मिला तुझे यह जामा-ए-इन्सानी ।
अफ़सोस सद बार तूने इसकी क़द्र न जानी ।
बेशक़ीमत मिला था ये जामा मालिक की बन्दगी के लिये ।
बन्धनों से छुटकारा पाने और रूह की फ़र्ख़न्दगी के लिये ।।
क्या काम तूने इस तन इन्सानी से लिया ।
विषयों में फँस कर जन्म यूँही बरबाद किया ।
महापुरुष इस दुर्लभ अवसर की याद दिलाते हैं।
कि ऐसे अवसर फिर न बार-बार हाथ आते हैं ।
मानकर सन्तों के वचन जो अपना काम कर जाते हैं ।
नाम भक्ति की सच्ची कमाई कर वो भव से तर जाते हैं ।।
(57)
दुर्लभु मानुष जन्म को पाकर, किसने लाभ उठाया है।
दुनिया की ममता छोड़कर, जो सन्त शरण में आया है ।।
गुरु शब्द की करके कमाई, सच्चा धन कमाया है ।
जीवन भी खुशियों से भर लिया, दरगाह में मान माया है ।।
(58)
कई जन्मों से जीवात्मा को, बहुत इन्तज़ार थी ।
वो अपने मक़सद को पाने के लिये, बहुत बेक़रार थी ।।
भागों से मिल गया मानुष जन्म, इससे सच्चा लाभ उठा ले ।
मालिक की कर भजन बन्दगी, जीवन सफल बना ले ।।
(59)
दुनिया में जिसने दिल लगाया, उसकी हालत ज़ार है।
जिस गुरुमुख ने भक्ति को अपनाया, उसका दिल सरशार है ।।
(60)
सत्त नाम को छोड़कर, माया संग करे प्यार ।
सत्न त्याग कौड़ी संग रचै, देखा यह संसार ।।
सत्संग मिले तो सोझी पावै, मिटे अज्ञान अंधकार ।
ज्ञान प्रकाश जब हिरदै जागै, तब पावै तत् का सार ।।